सरकार की ‘अनदेखी’ के खिलाफ सड़कों पर उतरने को मजबूर हुए आपदा पीड़ित
* 55 प्रभावित मकानों को तोड़े जाने से भड़का आक्रोश, आर-पार की लड़ाई का ऐलान
* सुरक्षात्मक कार्यों में लापरवाही का भी लगा गंभीर आरोप
जोशीमठ ।
जोशीमठ भू-धंसाव आपदा के प्रभावितों का जख्म एक बार फिर हरा हो गया है। सरकार और प्रशासन के रुख से नाराज आपदा प्रभावितों और ‘जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति’ ने अब आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। शनिवार को जोशीमठ नगर पालिका परिसर में आयोजित एक महत्वपूर्ण बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि सरकार पर दबाव बनाने के लिए आगामी सोमवार से 48 घंटे का उग्र धरना-प्रदर्शन शुरू किया जाएगा। प्रभावितों ने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि समय रहते उनकी सुध नहीं ली गई, तो इस बार का आंदोलन और अधिक उग्र होगा, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।
वादे अधूरे, 11 सूत्रीय मांग पत्र पर फैसला न होने से नाराजगी
बैठक की शुरुआत में ही आपदा पीड़ितों का गुस्सा फूट पड़ा। जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति के संयोजक अतुल सती ने सरकार की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि समिति और प्रभावित परिवारों की ओर से सरकार को 11 सूत्रीय मांग पत्र सौंपा गया था, जिसमें मुख्य रूप से:
प्रभावित परिवारों के लिए सुरक्षित स्थान पर भूमि के बदले भूमि देना,
विस्थापितों के लिए उचित मुआवजा, राजीव आवास और प्रधानमंत्री आवास की व्यवस्था करना,
पुरानी पुश्तैनी संपत्तियों और भवनों का न्यायसंगत मूल्यांकन कर उचित मुआवजा देना शामिल था।
अतुल सती ने आरोप लगाया, “सरकार ने हमारी जायज मांगों को पूरी तरह अनसुनी कर दिया है। प्रभावितों को सुरक्षित बसाने से पहले ही प्रशासन ने जबरन बेघर करने की नीति अपना ली है।”
’पहले रहने की व्यवस्था हो, फिर चले हथौड़ा’
समिति के पदाधिकारियों और प्रभावितों का सबसे बड़ा विरोध इस बात को लेकर है कि वर्तमान में 55 प्रभावित परिवारों के मकानों पर तोड़फोड़ की कार्रवाई शुरू कर दी गई है। हालांकि प्रशासन का दावा है कि इन मकानों का मुआवजा दिया जा चुका है, लेकिन आंदोलनकारियों का तर्क है कि मुआवजे की राशि से आज के दौर में नया आशियाना खड़ा करना असंभव है।
”प्रशासन को चाहिए था कि वह पहले प्रभावित परिवारों के रहने की स्थाई और सुरक्षित व्यवस्था करता, उसके बाद ही भवनों को ढहाने का काम शुरू किया जाता। लेकिन सरकार सीधे तौर पर लोगों को बेघर करने का काम कर रही है, जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।”
— अतुल सती, संयोजक (जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति)
’बिना लड़े हक नहीं मिलेगा’—मातृशक्ति ने भरी हुंकार
इस बैठक में जोशीमठ की महिलाओं और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। गांधीनगर वार्ड की सभासद ललिता देवी, आपदा प्रभावित लक्ष्मी देवी, नीलम परमार और गीता परमार ने एकजुटता का आह्वान करते हुए कहा कि अब सरकार के आगे गिड़गिड़ाने का समय चला गया है।
प्रभावित महिलाओं ने एक स्वर में कहा, “बिना लड़े अब हमारा हक मिलने वाला नहीं है। जब तक सभी प्रभावितों को सुरक्षित भूमि और न्यायसंगत मुआवजा नहीं मिल जाता, तब तक हम पीछे नहीं हटेंगे। पूरे जोशीमठ को एकजुट होकर इस उग्र आंदोलन में आहुति देनी होगी।” बैठक में मौजूद मुकेश कुमार और दीपक ने भी आंदोलन को हर स्तर पर ले जाने की चेतावनी दी।
सुरक्षात्मक कार्यों पर भी उठे गंभीर सवाल
एक तरफ जहां जोशीमठ के कुछ संवेदनशील वार्डों में भू-धंसाव को रोकने के लिए शासन द्वारा सुरक्षात्मक (Mitigation) कार्य चलाए जा रहे हैं, वहीं जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति ने इन कार्यों की गुणवत्ता पर भी गंभीर उंगली उठाई है। समिति का आरोप है कि धरातल पर हो रहे सभी सुरक्षात्मक कार्य घोर लापरवाही के साथ किए जा रहे हैं, जिससे भविष्य में खतरा कम होने के बजाय और बढ़ सकता है। समिति के अनुसार, यह केवल औपचारिकता पूरी करने जैसा है और इसी लापरवाही के खिलाफ अब शासन-प्रशासन पर चौतरफा दबाव बनाने की रणनीति तैयार की गई है।
शनिवार की इस आक्रोश बैठक के बाद यह साफ हो गया है कि सोमवार से जोशीमठ में एक बार फिर आंदोलन की तपिश महसूस होगी। 48 घंटे के इस धरने को सफल बनाने के लिए संघर्ष समिति ने क्षेत्र के व्यापारियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम जनता से समर्थन की अपील की है। अब देखना यह होगा कि इस महा-धरने की आहट सुनकर शासन-प्रशासन समय रहते चेतता है या जोशीमठ एक बार फिर बड़े आंदोलन की आग में झुलसने को मजबूर होगा।
