Home उत्तराखण्ड पिरूल वुमेन ”मंजू शाह’, को मिला गौरा देवी पुरस्कार

पिरूल वुमेन ”मंजू शाह’, को मिला गौरा देवी पुरस्कार

पिरुल को रोजगार, पर्यावरण संरक्षण से जोड़कर दिखलाई नयी राह..

by zerogroundnews

​चमोली ।

जनपद चमोली की नैसर्गिक सुंदरता से सराबोर सुप्रसिद्ध मिलेट वैली और पंचम केदार कल्पेश्वर ऊर्गम घाटी में आयोजित दो दिवसीय “गौरा देवी पर्यावरण, प्रकृति एवं पर्यटन विकास मेले” के दूसरे दिन आयोजित एक भव्य समारोह में देश-दुनिया में ‘पिरूल वुमेन’ के नाम से विख्यात मंजू शाह को प्रतिष्ठित ‘गौरा देवी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। उन्हें यह सम्मान पहाड़ों के जंगलों के लिए सबसे बड़ा नासूर माने जाने वाले चीड़ के पत्तों (पिरूल) को स्थानीय रोजगार, वनाग्नि नियंत्रण और ग्रामीण विकास की मुख्यधारा से जोड़ने तथा अपनी अनूठी हस्तशिल्प कला को वैश्विक पटल पर स्थापित करने के लिए प्रदान किया गया है। मूल रूप से अल्मोड़ा जनपद के द्वाराहाट अंतर्गत हाट गांव की निवासी और वर्तमान में राजकीय इंटर कॉलेज ताड़ीखेत में प्रयोगशाला सहायक के पद पर कार्यरत मंजू आर शाह ने अपनी रचनात्मकता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से पिरूल को आर्थिकी का एक सशक्त जरिया बनाया है। वह पिछले 16 वर्षों से पिरूल के इको-फ्रेंडली उत्पाद तैयार कर रही हैं और अब तक उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश तथा झारखंड जैसे राज्यों की 10 हजार से अधिक महिलाओं व बेटियों को इसका विशेष प्रशिक्षण देकर स्वावलंबी बना चुकी हैं, जिससे प्रधानमंत्री के ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को भी धरातल पर नई मजबूती मिल रही है।
​मेले के दौरान मंजू शाह द्वारा चीड़ की पत्तियों से निर्मित हस्तशिल्प उत्पादों की प्रदर्शनी मुख्य आकर्षण का केंद्र रही, जहां पिरूल से बनीं खूबसूरत टोकरियाँ, पूजा थाल, फूलदान, आसन, पेन स्टैंड, डोरमैट, आभूषण, पर्स और आकर्षक जवाहरकट जैसे दर्जनों उत्पादों को लोगों ने खूब सराहा। इसके साथ ही पिरूल से निर्मित उनकी अभिनव ‘पिरूल राखियों’ की मांग बाजार से लेकर ऑनलाइन पोर्टल्स तक व्यापक रूप से बढ़ रही है, जिससे ग्रामीण महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो रही हैं। गौरतलब है कि तकरीबन 71 फीसदी वन भू-भाग वाले उत्तराखंड में चीड़ के जंगलों का दायरा 15 प्रतिशत तक फैल चुका है, जहां बसंत ऋतु के बाद गिरने वाला अत्यधिक ज्वलनशील पिरूल हर साल वनाग्नि का मुख्य कारण बनता है और वनस्पतिक विविधता व वातावरण की नमी को नष्ट करता है। ऐसे संवेदनशील माहौल में मंजू शाह ने ग्रामीण महिलाओं को संगठित कर इस पर्यावरणीय अभिशाप को एक बड़े आर्थिक वरदान में बदल दिया है, जिससे एक तरफ जहां जंगलों की आग पर काबू पाने में मदद मिल रही है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए द्वार खुले हैं। शून्य निवेश नवाचार पर आधारित उनकी इस अनूठी पहल के लिए उन्हें पूर्व में हिमाचल सरकार द्वारा प्रशस्ति पत्र, साल 2019 में कोलकाता में आयोजित ‘इंडिया इंटरनेशनल साइंस फेस्टिवल’ में ‘बेस्ट अपकमिंग आर्टिस्ट अवॉर्ड’ सहित देश के दर्जनों प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है, और सूबे के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी महिला सशक्तिकरण के इस बेहतरीन मॉडल की मुक्तकंठ से सराहना कर चुके हैं।