देहरादून/चमोली
राजधानी देहरादून की द्वितीय अपर जिला जज की अदालत ने जनपद चमोली की पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष रजनी भंडारी और पूर्व जिला पंचायत उपाध्यक्ष लक्ष्मण सिंह रावत के बीच पिछले पांच वर्षों से चले आ रहे हाई-प्रोफाइल भवन विवाद पर अपना अंतिम और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट तौर पर माना कि दोनों पक्षों के बीच हुआ किरायेदारी समझौता (रेंट एग्रीमेंट) पूर्णतः वैध है, जिसके आधार पर अब प्रतिवादी लक्ष्मण सिंह रावत को तत्काल फ्लैट खाली कर कब्ज़ा रजनी भंडारी को सौंपना होगा।
क्या है पूरा मामला ?
यह विवाद देहरादून स्थित एक रिहायशी फ्लैट से जुड़ा है। पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष रजनी भंडारी ने यह फ्लैट पूर्व उपाध्यक्ष लक्ष्मण सिंह रावत को ₹15,000 मासिक किराये पर दिया था। अप्रैल 2020 से फरवरी 2021 तक के लिए लिखित अनुबंध किया गया था। आरोप था कि अनुबंध की अवधि समाप्त होने और मकान मालिक की ओर से बार-बार कानूनी नोटिस दिए जाने के बावजूद प्रतिवादी ने फ्लैट खाली नहीं किया। वर्ष 2021 में इस मामले ने चमोली की राजनीति में भी काफी सुर्खियां बटोरी थीं, जब जिले के दो शीर्ष जनप्रतिनिधि आपस में कानूनी जंग में उलझ गए थे।
अदालत का सख्त रुख: बकाया और हर्जाने का आदेश
माननीय न्यायालय ने किरायेदार के तर्कों को दरकिनार करते हुए मकान मालिक के अधिकारों को सुरक्षित रखा। अदालत ने अपने आदेश में कहा है कि:
बकाया किराया: किरायेदार को मार्च 2021 से सितंबर 2021 तक का कुल ₹90,000 बकाया किराया तुरंत चुकाना होगा।
दैनिक हर्जाना 16 सितंबर 2021 के बाद से जब तक फ्लैट का वास्तविक कब्जा रजनी भंडारी को नहीं मिल जाता, तब तक किरायेदार को ₹500 प्रतिदिन के हिसाब से क्षतिपूर्ति (डैमेज) भी अदा करनी होगी।
सियासी गलियारों में चर्चा
चमोली जिले की राजनीति के दो कद्दावर चेहरों के बीच का यह विवाद लंबे समय तक चर्चा का विषय रहा है। अब कोर्ट के इस स्पष्ट निर्णय के बाद जहाँ वादिनी पक्ष ने इसे न्याय की जीत बताया है, वहीं किरायेदारी के मामलों में यह फैसला एक नजीर की तरह देखा जा रहा है। कोर्ट ने कड़ा संदेश दिया है कि अनुबंध समाप्त होने के बाद संपत्ति पर कब्जा बनाए रखना न केवल अवैध है, बल्कि यह आर्थिक दंड का भी आधार बनेगा।
